Sunday, December 16, 2012

वक्त अब आए गयो
आओ चलें इक नई रामायण लिखें,
तुम बनों राम ये बने लक्ष्मण
मैं बन जाऊं बाल्मिक,
सीता हनु का कोई काम नहीं,
आओ चलें इक नई रामायण लिखें,
भाई ! घबराने की कोई बात नहीं
बन अब नहीं है जाना,
अब लंका की है नहीं जरुरत
देश में हैं रावण बहुत,
आओ चलें इक नई रामायण लिखें,
तीर कमान का कोई काम नहीं,
नाभि पर है नहीं चलाना,
बस इक फटके से है काम चले,
मच्छर मरें ज्यूँ मरेंगे रावण
संख्या इनकी है बहुत,
आओ चलें इक नई रामायण लिखें,
घर से बाहर नहीं है जाना
शबरी के तुम बेर न खाना
गले में हो न जाए कहीं ये खिच खिच,
आओ चलें इक नई रामायण लिखें

आओ चलें इक नई रामायण लिखें।





Wednesday, December 5, 2012


ऐ हसीं काग़ज़ के नोटों ! तुम्हारा साथ तो
किसी मरघटी खामोशी से कम नहीं,
मेरे वो चंद सिक्के ही, भले !
चलता हूँ तो बजते है,
लगता है कोई ख़ूबसूरत हसीं
हमसफ़र-खनकाती पायल,
मेरे नक्शे क़दम पर, मेरे साथ है।
- प्रियदर्शन शास्त्री

Saturday, December 1, 2012


सदियों से बुझा न सकी हवाएँ जिन दियों को,
तुमने उन्हें इक फूँक में बुझा दिया,
शातिर हो इन्सा तुम
इन हवाओं से भी ज्यादा,
हवाएँ तो बस इतना भर जानती थीं कि
दीए जलते हैं, पर तुम्हें पता है कि
दिए नहीं, सिर्फ़ बातियाँ जला करती हैं।
-प्रियदर्शन शास्त्री